आज तु बिखरा है
एक रोज तु निखरेगा ही
      ढला है जो आज सूरज 
     कल तो निकलेगा ही
माना तेरी मंजिल लोहे की जंजीरो मे है
पर जब तू तपेगा तेरी तपन से वो लोहा भी पिघलेगा ही।।
आज तू बिखरा है
एक रोज तू निखरेगा ही।
      ढला है जो आज सूरज
      कल तो निकलेग ही
मंजिलो के राहो में काटें तो सभी के है
पर तेरे अंदर अगर जूनुन है तो तु उन काटों पर चलेगा ही ।।
आज तु बिखरा है
एक रोज तो निखरेगा ही
      ढला है जो आज सूरज 
       कल तो निकलेगा ही
हवाऍ विपरीत ही कयो न चले 
तु कदम कदम चलेगा ही
तुझे कल के लिए तैयार होना है
आज तो गिरेगा ही।।