साप्ताहिक अध्ययन चक्र के तहत आज दिशा छात्र संगठन (Disha Students Organization) की ओर से गोरखपुर विश्वविद्यालय के सामने पंत पार्क में मुक्तिबोध के लेख 'नौजवान का रास्ता' का अध्ययन किया गया और उसके अलग-अलग पहलुओं व आज के हालात पर बातचीत की गई।




मुक्तिबोध लिखते हैं कि-

'अगर नौजवानी की ताक़त को, ज्ञान और बुद्धि तथा कर्म निश्चय की बिजली  में रूपान्तरित करते हुए, देश-निर्माण यानी मानव-निर्माण की ऊँची-से-ऊँची मंज़िल तक पहुँचाया जा सकता है, बंजर परती ज़िन्दगी में इश्‍क़ और इन्‍क़लाब की रूहानियत की फसल खड़ी की जा सकती है।..........'


'लेकिन नौजवानों के दिलोदिमाग़ की ताक़त को बिजली में रूपान्तरित करते हुए, देश-निर्माण और मानव-निर्माण में लगाने के लिए, जिस बिजलीघर की ज़रूरत होती है, वह हिन्दुस्तान में नदारद है।'


वर्तमान सामाजिक ढांचें में पूरे समाज में असुरक्षा, अनिश्चितता का माहौल है जिसमें एक नौजवान जिसका पूरा जीवन सामने है वो भी अनिश्चितता का शिकार है।


मुक्तिबोध आगे लिखते हैं कि-

'हिन्दुस्तान जैसे देश में – जहाँ अनन्य भूमि है, रत्नगर्भा धरित्री है, और उर्वर वसुन्धरा है, निरभ्र आकाश है, भव्य गम्भीर मेघराज है, और उत्तरस्थ हिमालय नगाधिराज है, विद्युत-शक्ति जल-शक्ति भूमि-शक्ति है – उस देश में अगर नौजवान के छाती की हड्डियाँ निकल आयें, चप्पल की कीलें पैर में लगातार छेद कर रही हों, चेहरे के बाल बढ़े हुए हों, और अगर वह एक पैसे की दो बीड़ी पीता हुआ किसी लड़की के मुखड़े को देख सिनेमा का एकाध फोश गाना गुनगुना उठता हो, तो उसके दिल की कभी भभकती हुई तो कभी फफकती हुई तमन्नाओं के ज्वार को देख हमें गुस्सा नहीं आता। उस पर गुस्सा करने वालों पर गुस्सा आता है। बल्कि उन शक्तियों की कमर तोड़ने की इच्छा होती है, उन काली ताक़तों को हमेशा के लिए जमीन में गाड़ देने के लिए भुजा ऊँची उठ जाती है, जिन्होंने मनुष्यता के रत्नों, इन नौजवानों, को इस तरह पीस डाला है।.........'


'पुराने शहीदों का नाम लेकर, भगतसिंह और सुभाष बोस की कीर्ति-कथा सुनाकर, गदर पार्टी और अनुशीलन दल की यशोगाथा सुनाकर, नौजवान के दिल में देशभक्ति और प्रेरणा तो ज़रूर भरी जा सकती है, लेकिन उन कथाओं के ज़रिये उसकी अपनी उलझनों को दूर नहीं किया जा सकता है। हर पीढ़ी के अपने नये अनुभव होते हैं, इस प्रकार नये, कि जो न पुरानी पीढ़ी के थे और न आगामी पीढ़ी के होंगे। फलतः नसीहतों की झाँझ बजाकर नौजवान की समस्या को हल नहीं किया जा सकता। सहानुभूति और मानवीय अनुभवमूलक ज्ञान की आवश्यकता अगर कहीं सबसे ज़्यादा पड़ती है, तो वह नौजवान के दिल को समझने में। नौजवान में श्रद्धा का जो आवेग होता है, हृदय की जो तेज़ निगाहें होती हैं, उन पर जिन्हें आप ज़िन्दगी के तज़ुर्बात कहते है। (यानी सांसारिक दृष्टि) उसकी धूलभरी परतें नहीं छायी रहतीं। फलतः, नौजवान यदा-कदा आपको, अपने अनुभव के कारण, मूरख प्रतीत हो सकता है। लेकिन यही उसकी अच्छाई है। जो नौजवान 19-20-21 साल में ही बूढ़ों की खूसट सांसारिक आँखों से ही दुनिया को देखने लगता है, समझ लीजिये कि उसमें साहस की प्रवृत्ति, नये अनुभव प्राप्त करने की जिज्ञासा और क्षमता, तथा जीवन के नव-नवीन उन्मेष का नितान्त अभाव है। ऐसा नौजवान नायब, तहसीलदार या आई.ए.एस. हो सकता है, लेकिन वह देश के किस काम का।'


युवाओं का देश कहा जाने वाले हमारे देश की हालत ये है कि नौजवानों की बड़ी फ़ौज बेरोजगार है। जिन नौजवानों को एक बेहतर सामाजिक ढांचा बेहतर जीवन देकर समाज और देश के लिए अच्छे वैज्ञानिक, कलाकार, चित्रकार, अन्वेषक, संगीतकार, नाटककार, फिल्मकार बना सकती है वहीं आज का सामाजिक ढांचा एक तरफ़ नौजवानों को लूट-खसोट,छेड़खानी, अपराध की तरफ़ ढकेल रहा है तो दूसरी तरफ़ नौजवानों को हताशा- निराशा डिप्रेशन और आत्महत्या की तरफ़ ढकेल रहा है।




मुक्तिबोध आगे लिखते हैं कि-

'जो समाज और जो राज्य नौजवानों को सतत उन्नतिशील  नहीं दे सकता, वह राज्य और वह समाज टिक नहीं सकता। इतिहास के विशाल हाथ इस वक्त उसकी क़ब्र खोदने के लिए बड़ा भारी गड्ढा तैयार कर रहे हैं।'


अंत में मुक्तिबोध नौजवानी का कौन-सा चित्र हमारे सामने रहना चाहिए? इस पर लिखते हैं कि-


तर्कसंगत शुद्ध विचार-सरणि और जिज्ञासा, तथ्यों को पहचानने, उनको संगठित कर उनके निष्कर्ष निकालने की शक्ति;


उज्ज्वल आदर्शवाद; बेईमानी, दुमुँही बातें, उत्तरदायित्व- हीनता, कामचोरी, मौखिक आदर्शवाद, घमण्ड, अहंकार आदि का अभाव;


ज्ञान के सामने, सत्य के सामने, हार्दिकता और मार्मिकता के सामने, प्रेम और त्याग के सामने, निरन्तर नम्रता और विनय;


मानव के सतत संघर्षमय विकास में आस्था; बुराइयों, बाधाओं, व्यवधानों, जनता के शत्रुओं पर मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृतिजन्य शुद्ध हृदय में विश्वास;


जनता के उद्धार में श्रद्धा, उनके संघर्षों की सफलता में आध्यात्मिक विश्वास, जनता की सृजनशील ऐतिहासिक शक्तियों की विजय का स्वप्न;


अपने अनुभवों से, दूसरों के तज़ुर्बों से, हमेशा सीखते रहने का जागरूक प्रयास और बेखटके और बेशरमाये अपनी ग़लतियों को सबके सामने स्वीकार करने की नम्र महानता; दूसरों की ग़लतियों और दुर्गुणों के – बशर्ते कि वे बहुत हानिकारक न हों – सहानुभूतिपूर्ण, ईमानदार विश्लेषण का उदारतापूर्ण उत्तरदायित्व, साहसपूर्ण और निश्चयात्मक क़दम बढ़ाने की योग्यता; तथा व्यक्तिगत जीवन का संगठन आदि-आदि ऐसी हैं जिन्हें और भी बढ़ाया जा सकता है। 



नोट : इस आर्टिकल में लिखी हुई जानकारी और Images Whatsapp से शेयर की गई है। SK Youth Hub ने इसे सिर्फ Publish किया है।


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