दिशा छात्र संगठन की ओर से पंत पार्क गोरखपुर विश्वविद्यालय के सामने आयोजित होने वाली साप्ताहिक अध्ययन चक्र में 9 नवम्बर को 'छात्रों- नौजवानों की बढ़ती आत्महत्या, जिम्मेदार कौन?'  विषय पर परिचर्चा रखी गई। परिचर्चा में छात्रों-नौजवानों में बढ़ रहे अवसाद और आत्महत्या के विभिन्न कारणों और आज के समय में छात्रों-नौजवानों के कार्यभार पर बातचीत की गई।

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चर्चा में बात रखते हुए दिशा छात्र संगठन की अंजलि ने कहा कि आज के समय में छात्रों-नौजवानों और खासतौर से शैक्षिक शहरों के छात्रों- नौजवानों में हताशा-निराशा, डिप्रेशन के साथ-साथ आत्महत्या लगातार बढ़ रही है।

पिछले दिनों इलाहाबाद में 28 दिनों में 25 से ज्यादा नौजवानों की आत्महत्या की खबर आई और यह वह घटना है जिसका रिकॉर्ड दर्ज हुआ था। एनसीआरबी की हाल ही के डाटा के अनुसार 2020 में आत्महत्या की दर में 10% का इजाफा हुआ है। इसी रिर्पोट के अनुसार 2018 में औसतन 35 बेरोजगार और 36 स्वरोजगार करने वाले लोग हर रोज आत्महत्या किए। छात्रों के आत्महत्या के पीछे की मुख्य वजह है उनके जीवन, उनके भविष्य की अनिश्चितता। 

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राष्ट्रीय आंकड़ा आयोग के अनुसार 2017-18 के दौरान भारत में पिछले 45 वर्षों के मुकाबले बेरोजगारी दर सबसे ज्यादा हैं। 30 से 34 करोड़ नौजवान बेरोजगारी में धक्के खा रहे हैं। कोरोना में पहले लॉकडाउन में 12 करोड़ लोग बेरोजगार हुए जबकि दूसरे लॉकडाउन में जनवरी से मई के बीच ढाई करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार हुए। 

छोटे-छोटे गांवों, कस्बों, शहरों से लाखों छात्र तैयारी करने शहरों की तरफ रुख करते हैं। ये नौजवान एक छोटे से कमरे में एक नौकरी के लिए तैयारी करते हुए अपनी पूरी नौजवानी गवां देते हैं। इस प्रक्रिया में नौजवान सामूहिकता से दूर हो जाते हैं, यह चीज़ उन्हें नफरत, अनिश्चितता, अविश्वास और ऊब की तरफ ले जाती है। निजीकरण की नीतियों की वजह से एक-एक करके सारे सरकारी विभाग निजी हाथों में सौंपे जा रहे हैं।

सरकारी रोजगार तो वैसे ही सिमटता जा रहा है, प्राइवेट में भी जो नौकरियां पैदा हो रही हैं ,उसमें कोई भविष्य की निश्चितता नहीं है। ज्यादातर काम ठेके,  संविदा पीस रेट, डेली वेजेज पर हो रहे हैं। केंद्र और राज्य में लगभग 24 लाख पद खाली हैं लेकिन उस पर कोई भर्ती नहीं हो रही है। ऐसे में छात्रों -नौजवानों के भविष्य के सामने अंधेरा है। 

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आठ- आठ, दस- दस साल तैयारी के बाद भी रोजगार ना मिलने की वजह से वे हताशा-निराशा, डिप्रेशन का शिकार होते हैं और अंत में कोई रास्ता ना दिखने पर आत्महत्या का रास्ता अख्तियार करते हैं। और सरकारों को नौजवानों की आत्महत्या से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला क्योंकि उनका मकसद ही नहीं है कि छात्रों -नौजवानों को रोजगार दिया जाए। वे तो इसके उलट रोजगार को खत्म करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं और एक-एक करके सरकारी विभागों में कामों को ठेके संविदा पर कराना, सरकारी विभागों को निजी हाथों में सौंपने का काम कर रही हैं।

आज नौजवानों को आत्महत्या के रास्ते पर ढकेलने वाले इस पूरे सिस्टम को समझना होगा कि इस सिस्टम के केंद्र में इंसान नहीं मुनाफा है जो छात्रों- नौजवानों के भविष्य को गर्त में ढकेल रहा है। ऐसे में छात्रों- नौजवानों को भी यह समझना होगा कि अपनी जिंदगी खत्म करने के बजाय इस पूरी लूटपर टिकी व्यवस्था को खत्म करने के लिए अपनी एकजुटता कायम करें।

 परिचर्चा में राजू, विकास, माया, मनोरमा, मुकेश, दीपक, राजकुमार, प्रभाकांत, अपूर्व, रोहित, सत्येंद्र आदि शामिल हुए।

                     भवदीय

                         राजू  

                9455 920 657



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